एक दीपक जो बुझ गया

एक दीप जो बुझ गया(सच्ची घटना)यह कहानी है एक ऐसे छात्र की, जिसके मन में ज्ञान का दीप टिमटिमाता था, पर समय के झंझावातों ने उसे असमय बुझा दिया।गाँव के घर की स्नेहपूर्ण छाँव में, आठवीं कक्षा तक, वह बालक पढ़ने-लिखने और जीवन के हर कार्य में एक सामान्य फूल की तरह खिल रहा था। पर नियति का विधान कुछ और था। शिक्षा की उच्च वेदी पर बलि चढ़ने के लिए, उसे घर की देहरी से दूर, एक अनजानी राह पर अकेला चलना पड़ा।प्रारंभ में सब ठीक था, पर धीरे-धीरे उसके जीवन में विषम परिस्थितियों का कोहरा छाने लगा। शायद यह एकाकीपन था, या नई जगह का बोझ, जिसने उसके मन को पढ़ने की मेज से हटाकर नींद की गोद में धकेल दिया। जहाँ उत्साह होना चाहिए था, वहाँ आलस्य ने घर कर लिया।नौवीं कक्षा में, जब उसने नए संस्थान में प्रवेश लिया, तो यह बदलाव सुधार की बजाय पतन का कारण बना। पुरानी संस्था की तुलना में, नई जगह ने उसके मन को और भी विचलित कर दिया। वह महसूस कर रहा था कि वह अपने अध्ययन की सीढ़ियों से फिसल रहा है, एक अंधकारमय गर्त की ओर। उसने अपनी समस्त ऊर्जा को एकत्रित करके एक बार फिर पढ़ाई की ओर झोंकने का हताश प्रयास किया। थोड़ा-बहुत सुधार हुआ भी, पर जिस गति से उसे दौड़ना चाहिए था, वह धीमी चाल पर सिमट कर रह गया।एकाकीपन का गहन अंधकारधीरे-धीरे, इस अकेलेपन ने उसके मन को एक गहरी टीस दी। वह सोचने लगा, “काश! मेरे माता-पिता मेरे साथ होते। वे इस दुर्बल स्थिति में मुझे देखकर अवश्य मेरी राह सँवारते, मुझ पर ध्यान केंद्रित करते।” पर यह दूरी, यह लाचारी, उनके हाथों को बाँध चुकी थी।यह विचार धीरे-धीरे उसकी मानसिक स्थिति को खोखला करने लगा। पढ़ाई में असफल रहने का भय अब बुरे और भयावह विचारों का रूप लेने लगा था। मगर, उन घोर निराशा के पलों में भी, उसके मानस पटल पर परिवार का स्नेहिल बिम्ब उभर आता। वह स्वयं को समझाता, खुद को बटोरने की कोशिश करता, पर एकाग्रता (कॉन्सेंट्रेशन) की डोर टूट चुकी थी, और कुछ भी ग्रहण नहीं हो पाता था।इसी दौरान, उसके मन में एक करुण और मार्मिक विचार जन्मा: “कितने ही लोग होंगे, जिनके पास संतान नहीं, या पुत्र का अभाव है। काश, कोई ऐसा पालक मिल जाता जो मुझे अपना पुत्र मानकर थोड़ा सा स्नेह और मार्गदर्शन दे देता! शायद मैं आज भी उभर जाता।” यह विचार इसलिए भी सशक्त हुआ क्योंकि कभी उसकी एक शिक्षिका ने उसे अपने पास रखकर पढ़ाने की बात कही थी, पर अब वह विद्यालय पीछे छूट चुका था।उस छात्र की यह सोच, केवल सोच बनकर ही रह गई। वह घुट-घुट कर इस संघर्ष को जीता रहा, और किसी तरह मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। परिणाम आया, तो अंक साधारण थे, जो उसके मनपसंद विषय का द्वार खोलने में असमर्थ रहे।अंतिम पतन और एक दुःखद अंतविवश होकर, उसने उस विद्यालय को छोड़ा और अन्य शहर में एक नए संकाय (स्ट्रीम) में इंटरमीडिएट में प्रवेश लिया। उसके मन में अब भी एक मंद उम्मीद थी कि वह अब सब कुछ ठीक कर लेगा।परंतु, उसकी स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती चली गई। वह पहले से अधिक कमजोर हो गया, और उसकी मानसिक व्याकुलता गंभीर रूप ले चुकी थी। उसके कोई मित्र नहीं थे। अच्छे, मेहनती छात्र उसे अपने समूह में शामिल नहीं करते थे, और वह स्वयं भटके हुए बच्चों की संगति नहीं चाहता था।जब उसकी यह दयनीय दशा डॉक्टर के सामने आई, तो वे भी आश्चर्यचकित रह गए। मानसिक चिकित्सक ने इलाज शुरू किया, जिससे दिमागी हालत में कुछ शांति आई, पर चिकित्सक की सलाह स्पष्ट थी: “कॉलेज में दोस्त बनाओ, उन्हें समय दो। वरना, समस्या और गंभीर हो जाएगी।”डॉक्टर की सलाह पर, मजबूरीवश, वह उन छात्रों के साथ रहने लगा जिन्हें वह पसंद नहीं करता था। उसकी विवशता यह थी कि यदि वह पढ़ने वाले बच्चों के साथ रहता, तो वहाँ केवल पढ़ाई-लिखाई की बातें होतीं, जिससे उसे अपनी असफलता का बोध होता और उसकी मानसिक स्थिति फिर बिगड़ने लगती।किसी तरह उसने इंटरमीडिएट भी पास कर लिया। वह अब भी यही आस लगाए था कि वह सब सही कर लेगा और वापस पढ़ने लगेगा।परंतु, स्थिति हर गुज़रते दिन के साथ बदतर होती गई। अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने के लिए, वह जबरदस्ती पढ़ाई में लगा रहा। तमाम कोशिशों के बावजूद कोई सुधार नहीं हुआ।और फिर, जब उसने स्नातक (ग्रेजुएशन) में प्रवेश लिया, तो अपनी असहनीय असफलताओं से त्रस्त होकर, एक रात वह सोया, और फिर उस बिस्तर से कभी नहीं उठा।यह कहानी उस दबे हुए मन की, उस असमय टूटे हुए हौसले की, और उस एकाकी संघर्ष की है जो, अंततः, एक दीप को हमेशा के लिए बुझा गया।

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